Supreme Court of India ने बुधवार को स्पष्ट किया कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने गृह मंत्रालय के सर्कुलर को चुनौती देने वाली याचिका को समय से पहले दायर बताया और कहा कि यह सिर्फ एक एडवाइजरी है, जिसमें किसी तरह की सजा का प्रावधान नहीं है।
यह मामला CJI Justice Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi और Justice Vipul M Pancholi की बेंच के सामने आया। बेंच ने कहा कि जारी दिशा-निर्देश केवल एक प्रोटोकॉल हैं और इन्हें लागू करना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ इस आधार पर कोई कार्रवाई होती है, तब इस मुद्दे पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
याचिकाकर्ता मुहम्मद सईद नूरी ने दलील दी थी कि इस तरह की एडवाइजरी के जरिए लोगों पर राष्ट्रगीत गाने का दबाव बनाया जा सकता है। हालांकि, कोर्ट ने इसे केवल आशंका बताया और कहा कि फिलहाल ऐसा कोई ठोस मामला सामने नहीं है।
गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को एक आदेश जारी किया था, जिसमें सरकारी और औपचारिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ बजाने की बात कही गई थी। साथ ही यह भी उल्लेख था कि यदि ‘वंदे मातरम्’ और Jana Gana Mana साथ में गाए जाएं, तो पहले ‘वंदे मातरम्’ प्रस्तुत किया जाएगा।
‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी काफी महत्वपूर्ण है। इसे Bankim Chandra Chattopadhyay ने 1875 में लिखा था और यह 1882 में उनके उपन्यास Anandamath में प्रकाशित हुआ। बाद में 1896 में Rabindranath Tagore ने इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया था, जिसके बाद यह स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रमुख नारा बन गया।