धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में सार्वजनिक अवकाश की मांग शामिल नहीं', सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की मांग पर महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार में किसी धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग करने का अधिकार शामिल नहीं है। सार्वजनिक अवकाश घोषित करना सरकार का नीतिगत निर्णय है।

कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि विकासशील राष्ट्र के तौर पर भारत को उत्पादकता और काम की निरंतरता को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने गुरु गोविंद सिंह की जयंती (प्रकाश पर्व) को पूरे देश में सार्वजनिक अवकाश (राजपत्रित अवकाश) घोषित करने की मांग खारिज कर दी।

इतना ही नहीं शीर्ष अदालत ने कहा कि सिख धर्म के सिद्धांत स्मरण, ईमानदार श्रम और नि:स्वार्थ सेवा पर विशेष बल देते हैं। गुरु गोविंद सिंह जी का जीवन साहस, अनुशासन और कर्तव्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का उदाहरण है। गुरु गोविंद सिंह जी के प्रति अगाध सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करते हुए कोर्ट ने कहा कि उनका जीवन न्याय और सांसारिक कर्तव्यों के निर्वहन के लिए एक अथक संघर्ष था।

इस परिप्रेक्ष्य में, उनकी विरासत का सम्मान करने का सबसे उत्तम तरीका शायद यह है कि समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन किया जाए, न कि केवल श्रद्धा की मांग करके सम्मान का कोई प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया जाए।

कोर्ट ने खारिज की याचिका

ये फैसला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने ऑल इंडिया शिरोमणि सिंह सभा की याचिका याचिका खारिज करते हुए दिया। कोर्ट ने कहा कि रिट याचिका के पीछे की भावना सम्माननीय है परंतु यह अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल रिट में न्यायिक हस्तक्षेप का न्यायोचित आधार नहीं बनती। याचिका में दसवें सिखगुरु, गुरु गोविंद सिंह जी के प्रकाश पर्व को पूरे देश में राजपत्रित अवकाश घोषित करने की मांग की गई थी।

सार्वजनिक अवकाश घोषित करना कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में- कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक अवकाश घोषित करना पूरी तरह से कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसमें न्यायालय का हस्तक्षेप उचित नहीं है। पीठ ने अनुच्छेद 25 में मिली धार्मिक स्वतंत्रता की दलील ठुकराते हुए कहा कि जहां एक ओर धर्म की स्वतंत्रता हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देती है, वहीं दूसरी ओर यह किसी धार्मिक अवसर को पूरे देश में अनिवार्य सार्वजनिक अवकाश के रूप में राज्य से मान्यता दिलाने के अधिकार तक विस्तारित नहीं होती।

कोर्ट ने कहा कि भारत की संघीय संरचना राज्यों को भिन्न निर्णय लेने की अनुमति देती है। राज्यों द्वारा पेश सामग्री ये दर्शाती है कि सार्वजनिक अवकाशों का निर्धारण स्थानीय आवश्यकताओं और सामाजिक सांस्कृतिक कारकों पर आधारित होता है। कोर्ट ने कहा कि ये काम कार्यपालिका के विवेक पर छोड़ना उचित है। अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तर्कसंगत भिन्नता को स्वीकारता है।

भिन्नता को भेद भाव नहीं माना जा सकता- कोर्ट

कोर्ट ने यह भी माना कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में पहले से ही अनेक धार्मिक अवसरों पर अवकाश दिए जाते हैं। अलग-अलग राज्यों में स्थानीय परिस्थितियों और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुसार छुट्टियां निर्धारित की जाती हैं, जो संघीय ढांचे का हिस्सा है। इसलिए इसमें भिन्नता को भेद भाव नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि मांगी गई राहत देने से अलग-अलग समूहों से इसी तरह की मांगों की बाढ़ आ सकती है। नतीजन सार्वजनिक अवकाशों का अव्यवहारिक विस्तार होगा और शासन व प्रशासनिक कामकाज पर बुरा असर पड़ेगा।